Something SERIOUS Is Happening in JAPAN! The ECONOMY Is Slowing FAST
नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका नॉलेज नेट पर जहां हम दुनिया भर के फैक्ट्स, देशों की असलियत और हर बड़ी ग्लोबल हलचल को आसान हिंदी में समझते हैं। एक ऐसा देश जिसने वॉकमैन से लेकर वर्ल्ड क्लास रोबोटिक्स और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स बनाकर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। जहां Sony, Panasonic और Toyota जैसे नाम सुनते ही लोगों में भरोसा जाग जाता था। लेकिन आज वही देश 2025 में ग्लोबल जीडीपी रैंकिंग में गिरकर चौथे नंबर पर पहुंच चुका है। 2024 में जर्मनी ने जापान को पीछे छोड़ दिया और अब इंडिया भी आने वाले सालों में उसी रैंकिंग में ऊपर चढ़ते हुए जापान को और नीचे धकेलने के बेहद करीब है। सोचिए जिस जापान से कभी अमेरिका तक डरता था कि यह देश एक दिन ग्लोबल इकॉनमी की दिशा बदल देगा। वही जापान आज अपनी धीमी इकॉनमी, एजिंग पापुलेशन और इनोवेशन की घटती स्पीड की वजह से पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चेतावनी बन चुका है। डर सिर्फ इस बात का नहीं कि जापान नीचे कैसे आया? असली चिंता यह है कि क्या बाकी दुनिया भी उसी रास्ते पर जा रही है? क्योंकि जापान में जो आज हो रहा है, कम ग्रोथ, बढ़ती उम्र की आबादी और स्टैगेंट इकॉनमी। वह आने वाले समय में कई देशों के फ्यूचर की झलक भी हो सकता है। पिछले 40 साल से जापान एक ऐसी आर्थिक चुप्पी में फंसा हुआ है जिससे बाहर निकलने की कोई कोशिश काम नहीं आई। टॉप तीन अर्थव्यवस्थाओं से बाहर हो चुका जापान आज अपनी ही मुद्रा को गिरते हुए देख रहा है और दुनिया के अर्थशास्त्री इस सवाल में उलझे हैं। इतने बड़े देश की मशीन आखिर कहां जाकर रुक गई? यह सिर्फ गिरावट नहीं थी। यह एक लंबा ठंडा आर्थिक जमाव था जिसने पूरी दुनिया को डरा दिया। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस ठहराव के बीच भी जापान का आम नागरिक बाकी दुनिया से बेहतर, सुरक्षित और शांत जीवन जी रहा है। घर सस्ते हैं, अपराध कम है, नौकरी सुरक्षित है और लोग कम घंटे काम करते हैं। यानी जापान एक ऐसे मॉडल में बदल चुका है जहां अर्थव्यवस्था रुकी हुई है। लेकिन समाज स्थिर है। यह दुनिया के लिए एक खतरनाक संकेत है। क्या भविष्य में हर देश को तेजी छोड़कर स्थिर गरीबी में जीना पड़ेगा? लेकिन इस स्टेबिलिटी के पीछे एक बड़ा ट्विस्ट है जिसकी जड़े 1985 के एक ग्लोबल फाइनेंसियल एग्रीमेंट यानी प्लाज़ा अकॉर्ड में मिलती हैं। 1985 का प्लाज़ा अकॉर्ड यह वह मोड था जिसने जापान को हिला दिया। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने डॉलर को कमजोर करने का फैसला लिया। जापान को मजबूरी में मानना पड़ा वरना ट्रेड वॉर खड़ा हो जाता। डॉलर कमजोर, यन मजबूत और इसके साथ ही जापानी एक्सपोर्ट महंगे। यही वह झटका था जिसने इस देश की तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था के ब्रेक दबा दिए। मगर असल खतरा तब शुरू हुआ जब इस डील के बाद जापान की संपत्ति, जमीन और शेयर बाजार में अनियंत्रित बबल बन गया। पैसा इतना बहने लगा कि लोग जमीन को सोने से भी कीमती मानने लगे। डॉलर गिराने के बाद यन की वैल्यू तेजी से बढ़ गई। अचानक जापानीज लोग दुनिया के अमीर देशों में गिने जाने लगे। बाइंग पावर बढ़ी, इन्वेस्टमेंट्स तेजी से बढ़े, रियलस्टेट और शेयर मार्केट का नाम भी लोग एक्साइटमेंट में लेने लगे। यह वही समय था जब जैपनीज एसेट प्राइसेस स्काई रॉकेट कर गई। टोक्यो के कुछ इलाकों की जमीन का दाम पूरी अमेरिका की सारी जमीन से ज्यादा बताया जा रहा था। यह बबल था। लेकिन 1997 का एशियाई संकट इस सपने को चखनाचूर कर गया। बबल फूटा, अरबों डॉलर के नुकसान हुए और जापान एक दिन से दूसरे दिन ठहराव वाली अर्थव्यवस्था बन गया। यह सिर्फ मंदी नहीं थी। यह एक राष्ट्रीय मनोवैज्ञानिक सदमा था। यहीं से शुरू हुआ जापान का स्टैग्नेशन। एक ऐसी स्थिति जहां चीजें खराब तो नहीं होती पर सुधार भी नहीं होता। यानी ना कोई बढ़त ना कोई गिरावट। बस उसी स्तर पर ठहर जाना। लेकिन अगर सिर्फ क्राइसिस ही कारण होता तो जापान फिर से बाउंस बैक कर लेता। असली रीजन उससे कहीं गहरा है। जापानीज कल्चर। जापान में रिस्क लेना हमेशा से एक डर की तरह देखा जाता है। लोग जॉब सिक्योरिटी को एंटरप्रेन्योरशिप से ज्यादा सुरक्षित मानते हैं। गवर्नमेंट अप्रूवल्स और पेपर वर्क इतने हैवी हैं कि नया स्टार्टअप शुरू करना हजारों लोगों की हिम्मत ही तोड़ देता है। रिजल्ट यह कि इनोवेशन धीरे-धीरे कम होने लगा। जापान कभी ऐसी जगह था जहां से वॉकमैन, प्लेस्टेशन, वर्ल्ड क्लास रोबोट्स और बेस्ट क्वालिटी इलेक्ट्रॉनिक्स पूरी दुनिया में जाते थे। उस समय लोग मानते थे कि अगर फ्यूचर टेक्नोलॉजी कहीं बनेगी तो वह जापान में ही बनेगी। लेकिन जब स्मार्टफोन एरा शुरू हुआ तो जापान की बड़ी कंपनियां उसी रेस में पीछे रह गई। जहां Apple और Samsung दुनिया पर छा गए। वहीं जापान की टेक कंपनी सॉफ्टवेयर, एप्स और मॉडर्न कंज्यूमर टेक के नए गेम में पेस ही पकड़ नहीं पाई। और यहां एक और बड़ी रुकावट सामने आई। इंग्लिश लैंग्वेज बैरियर। आज की ग्लोबल टेक दुनिया में इंग्लिश ऑलमोस्ट एसेंशियल है। चाहे नए आइडियाज सीखने हो, ग्लोबल कंपनियों के साथ काम करना हो या नई टेक्नोलॉजी अर्ली स्टेज में अडॉप्ट करनी हो। लेकिन जापान ने कई सालों तक खुद को भाषा के मामले में दुनिया से थोड़ा अलग रखा। इसका सीधा असर यह हुआ कि ग्लोबल मार्केट से सीखने, इंटरनेशनल कोलैबोरेशन करने और वर्ल्ड की स्पीड से चलने में जापान को बहुत दिक्कत आने लगी। लेकिन आश्चर्य यह है कि वीक ग्रोथ के बावजूद जापान में लोग पीसली जी रहे हैं। इनफ्लेशन लगभग जीरो मतलब सैलरी ना बढ़े तो भी खर्च भी नहीं बढ़ते। जॉब्स सिक्योर हैं। एजुकेशन टॉप लेवल है। स्ट्रीट सेफ हैं। हेल्थ केयर अफोर्डेबल है। आम आदमी के लिए जापान आज भी एक वेरी स्टेबल कंट्री है। हाउसिंग का भी एक अनोखा मॉडल है। वेस्ट के जैसे घर इन्वेस्टमेंट नहीं बल्कि एवरीडे लिविंग प्रोडक्ट माने जाते हैं। इसलिए घर सस्ते हैं। लोन आसान है और रियलस्टेट कभी आर्टिफिशियल तरीके से ऊपर नहीं जाता। ऊपर से इन्हहेरिटेंस टैक्स इतना ज्यादा है कि फैमिलीज के पास प्रॉपर्टी मोनोपोलीज बन ही नहीं पाते। इससे इनकलिटी ऑटोमेटिकली कंट्रोल में रहती है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू खतरनाक है। पपुलेशन तेजी से बूढ़ी हो रही है। यंग वर्कफोर्स लगातार कम होती जा रही है। 2024 से 25 के आंकड़ों के अनुसार जापान की जनसंख्या 9 लाख से ज्यादा घट गई। यह अब तक की सबसे तेज वार्षिक गिरावट है। वर्किंग एज यानी 15 से 64 साल के लोग अब कुल जनसंख्या का लगभग 59.6% रह गए हैं। और 65 प्लस उम्र वालों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। इस डेमोग्राफिक इमंबैलेंस के कारण इकॉनमी में फ्रेश आइडियाज, न्यू एनर्जी और मैन पावर की कमी हो रही है। कई कंपनियां पुराने कर्मचारियों को बरकरार रख रही हैं। 2025 की एक रिपोर्ट कहती है कि 22% कंपनियों में स्टाफ का 80% हिस्सा 45 साल या उससे ऊपर का है। कंपनीज़ भी एक ट्रेडिशनल सिस्टम में फंस गई हैं। लाइफटाइम एंप्लॉयमेंट मॉडल इसमें एंप्लाइजज़ को रेयरली निकाला जाता है। पर कंपनी उन्हें ऐसे काम दे देती है जो शायद प्रोडक्टिव नहीं होते। इससे नेशनल प्रोडक्टिविटी नीचे जाती है और ग्लोबल कंपटीशन में जापान स्लो पड़ने लगता है। गवर्नमेंट डे लगातार बढ़ता जा रहा है। इंटरेस्ट रेट्स दशकों बाद बढ़ रहे हैं और इकोनॉमिस्ट्स को पता नहीं कि इसका लॉन्ग टर्म असर कैसा होगा। दुनिया के दूसरे देश डेवलप हो रहे हैं। लेकिन जापान ग्लोबल रैंकिंग में धीरे-धीरे पीछे जा रहा है। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि जापान आज दुनिया को एक मिरर दिखा रहा है कि एजिंग पॉपुलेशन और स्लो ग्रोथ वाले देशों का भविष्य कैसा हो सकता है। शायद आने वाले 20 से 30 साल में कई देशों को यही मॉडल फॉलो करना पड़े। कम ग्रोथ लेकिन हाई सोशल स्टेबिलिटी। और इस नेशनल स्टैग्नेशन के बीच एक जगह है जो पूरे जापान की कहानी से अलग है। टोक्यो। यह शहर आज भी हाइपर प्रोडक्टिव, सुपर रिच और दुनिया के टॉप ग्लोबल सिटीज में गिना जाता है। टोक्यो एक तरह का मिनी कंट्री जैसा लगता है जो पूरे जापान की इकोनॉमिक ग्रेविटी को अपने अंदर खींचता है। यही जापान की पूरी कहानी है। एक सुपर पावर बनने का सपना, एक अचानक लगा झटका और एक ऐसी स्लो इकॉनमी जो फिर भी दुनिया की सबसे स्टेबल सोसाइटीज में से एक बनी हुई
Japan, once the world’s tech powerhouse, is now facing a CRISIS no one saw coming. Discover how demographic decline, aging population, and stagnant growth are threatening its economy. Learn why Japan’s GDP is falling, debt is rising, and global powers like Germany and India are overtaking it. Find out how workforce shortages and innovation slowdown are creating a ticking economic time bomb. Watch now to see the shocking truth about Japan’s future and why it could impact the entire world!
20 Comments
क्या जापान के नागरिक ग़रीब हैं– मोदी के भारत के नागरिकों से भी अधिक?
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Japan ki earthbawastha giri nahi hai , Germany aage nikal gaya aur ab chaukane ki bari India ki hai.
इंग्लिश इंटरनेशनल लॉन्गवेज है
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