Something SERIOUS Is Happening in JAPAN! Can Immigration Save the Economy?
नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका नॉलेज नेट पर। एक ऐसा देश जो टेक्नोलॉजी में दुनिया से आगे है। जहां बुलेट ट्रेन सेकंड की सटीकता से चलती है। जहां रोबोट काम करते हैं। लेकिन वहां इंसानों की संख्या हर साल तेजी से घटती जा रही है। जापान आज इसी सच्चाई का सामना कर रहा है। साल 2024 में जापान की आबादी में 9 लाख से ज्यादा लोगों की कमी आई। जो अब तक की सबसे बड़ी सालाना गिरावट है और यह लगातार 16वां साल है जब देश की जनसंख्या घटी है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह एक चेतावनी है। सवाल यह नहीं है कि जापान में क्या हो रहा है? सवाल यह है कि क्या यह समस्या अब सुलझाई जा सकती है या नहीं? इस साल 2025 तक जापान में लगभग 2 करोड़ से अधिक लोग 75 साल या उससे ऊपर हैं और इसी वजह से स्वास्थ्य सेवाओं, लंबी अवधि की देखभाल और पेंशन जैसे खर्चों पर दबाव पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। लेकिन टैक्स देने वाले और काम करने वाले लोगों की संख्या घटती जा रही है। जिससे यह समस्या सिर्फ जनसंख्या की गिरावट नहीं रह जाती बल्कि पूरे सामाजिक और आर्थिक सिस्टम के लिए एक बड़ा संकट बन जाती है। अगर हम आंकड़ों को देखें तो 2025 की शुरुआत में जापान की कुल आबादी घटकर लगभग 12.43 करोड़ रह गई है। यह करीब 0.44% की गिरावट है। 65 साल से ज्यादा उम्र के लोग अब देश की लगभग 30% आबादी हैं। जबकि 15 से 64 साल की कामकाजी आबादी 1995 से लगातार घट रही है और अब सिर्फ 60% के आसपास रह गई है। यही असंतुलन पूरे सिस्टम पर दबाव बना रहा है। सरकार को इस स्थिति का अंदाजा काफी पहले हो गया था। 2018 में ही यह अनुमान लगाया गया था कि 2025 से 2040 के बीच पेंशन और सोशल सिक्योरिटी पर खर्च लगभग 60% तक बढ़ सकता है। जापान के बुजुर्ग दुनिया के सबसे स्वस्थ माने जाते हैं और कई लोग 70 की उम्र के बाद भी काम करते हैं। लेकिन लंबी उम्र का मतलब है लंबे समय तक सरकारी खर्च। यही वह गणित है जो जापान को आर्थिक और सामाजिक दोनों मोर्चों पर कमजोर कर रहा है। अब सवाल उठता है कि सरकार ने क्या किया? जापान की सरकारों ने जन्म दर बढ़ाने के लिए कई कोशिशें की। प्रधानमंत्री शिंजो आबे के समय से नर्सरी सब्सिडी, चाइल्ड केयर नियमों में डील और महिलाओं को नौकरी में बनाए रखने जैसी नीतियां लाई गई। लेकिन सच्चाई यह है कि इन सब का असर बहुत सीमित रहा। बच्चे पैदा करने का फैसला सिर्फ पैसों से नहीं होता। 2023 में सरकार ने चाइल्ड केयर बजट बढ़ाकर 3.5 ट्रिलियन यन कर दिया और 2024 में एक नई योजना को मंजूरी दी गई जो 2026 से लागू होगी और 2028 तक 1 ट्रिलियन यन तक पहुंचेगी। इसमें तीसरे बच्चे पर ज्यादा भत्ता, पैरेंटल लीव, डे केयर सुविधा और आय सीमा हटाने जैसे कदम शामिल हैं। लेकिन इसके बावजूद सामाजिक समस्याएं जस की तस हैं। जापान में लंबे काम के घंटे, शादी की घटती दर और पारंपरिक सोच बड़ी बाधा है। इसी कारण सिर्फ 2.4% बच्चे शादी के बाहर जन्म लेते हैं। जबकि अमेरिका और यूरोप में यह आंकड़ा करीब 40% है। इसका मतलब साफ है कि समाज का ढांचा ही बच्चों के अनुकूल नहीं है। यहीं से आता है वह तर्क जिसे कई विशेषज्ञ अनसॉल्वेबल कहते हैं। उनका मानना है कि जापान की घटती वर्क फोर्स को बिना इमीग्रेशन के बचाना लगभग नामुमकिन है। पहले जापान की इमीग्रेशन नीति बेहद सख्त थी और विदेशी आबादी 3% से भी कम थी। लेकिन हाल के वर्षों में यह सोच बदली। 2019 में सरकार ने एसएसडब्ल्यू एक वीजा शुरू किया। जिससे विदेशी कामगार कुछ खास सेक्टरों में 5 साल तक काम कर सकते हैं। 2023 में एसएसडब्ल्यू दो वीजा लाया गया जिसमें परिवार को साथ लाने और लंबे समय तक रहने की अनुमति दी गई। 2024 में इसे और सेक्टरों तक बढ़ा दिया गया। आज इन वीजा धारकों में सबसे ज्यादा लोग वियतनाम से हैं। उसके बाद इंडोनेशिया का नंबर आता है। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या इमीग्रेशन यानी विदेशी कामगार ही जापान की गिरती आबादी का असली जवाब बन सकता है? एक्सपर्ट्स कहते हैं कि जापान में जन्म दर गिरने की वजह सिर्फ आर्थिक नहीं है बल्कि यह एक गहरी सामाजिक और सिस्टम से जुड़ी समस्या है। जापान में रहने की लागत बहुत ज्यादा है। घर महंगे हैं। सैलरी सालों से लगभग स्थिर है और काम का दबाव इतना ज्यादा है कि लोगों के पास निजी जीवन के लिए समय ही नहीं बचता। ऐसे माहौल में युवा पीढ़ी ना तो आसानी से डेटिंग का फैसला कर पा रही है ना शादी का और ना ही बच्चों की जिम्मेदारी उठाने को तैयार है। खासकर बड़े शहरों में लोग पहले खुद को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना चाहते हैं। लेकिन सिस्टम उन्हें यह मौका ही नहीं दे रहा। महिलाओं के लिए स्थिति और भी कठिन है क्योंकि जापान अब भी एक पितृसत्तात्मक समाज माना जाता है। जहां शादी के बाद महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे करियर से ज्यादा परिवार और बच्चों की देखभाल को प्राथमिकता दें। भले ही सरकार यह दिखाने की कोशिश करती है कि पुरुषों को भी घरेलू जिम्मेदारी में शामिल किया जा रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कामकाजी महिलाओं पर दोहरा बोझ बना हुआ है। यही कारण है कि कई महिलाएं शादी या बच्चे पैदा करने से दूरी बना रही हैं। सिंगल पैरेंट परिवार जापान में आज भी बहुत कम है क्योंकि सामाजिक तौर पर इसे स्वीकार नहीं किया जाता और इससे महिलाओं के विकल्प और सीमित हो जाते हैं। यह समस्या सिर्फ जापान तक सीमित नहीं है बल्कि चीन और दक्षिण कोरिया जैसे दूसरे पूर्वी एशियाई देशों में भी यही पैटर्न दिख रहा है। जहां तेज विकास के बाद अब समाज उम्रदराज होता जा रहा है और युवा आबादी पीछे हट रही है। इन हालात में जापान सरकार ने साफ तौर पर इमीग्रेशन को एक जरूरी विकल्प के रूप में देखना शुरू किया है। हाल के वर्षों में सरकार ने डिजिटल नोमैड वीजा ल्च किया है। ताकि दुनिया भर के प्रोफेशनल्स जापान में रहकर काम कर सकें और साथ ही विदेशी कामगारों को ज्यादा स्किल्ड बनाने के लिए नई योजनाएं शुरू की गई हैं। हालिया सरकारी डाटा के मुताबिक जापान में विदेशी निवासियों की संख्या महज एक साल में 10% से ज्यादा बढ़कर करीब 36 लाख के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। यह बदलाव मामूली नहीं है। क्योंकि दशकों तक जापान को दुनिया के सबसे बंद और सख्त इमीग्रेशन सिस्टम वाले देशों में गिना जाता था। जहां विदेशी आबादी बढ़ना लगभग असंभव माना जाता था। आज वही देश धीरे-धीरे अपने दरवाजे खोलने को मजबूर दिख रहा है। लेकिन यहां एक बड़ा विरोधाभास भी सामने आता है। एक तरफ विदेशी कामगारों की संख्या बढ़ रही है। वहीं दूसरी तरफ सरकार के अपने दीर्घकालिक मॉडल यह साफ कहते हैं कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे तो 2070 तक जापान की कुल आबादी लगभग 30% तक घट सकती है। यानी इमीग्रेशन बढ़ने के बावजूद जनसंख्या गिरावट पूरी तरह रुकने वाली नहीं है। हां, सरकारी अनुमान यह जरूर मानते हैं कि अगर अंतरराष्ट्रीय माइग्रेशन लगातार बढ़ता रहा, तो आने वाले दशकों में आबादी घटने की रफ्तार कुछ हद तक धीमी की जा सकती है। लेकिन यह कोई स्थाई समाधान नहीं दिखता। यही वजह है कि आज जापान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां हर फैसला अपने साथ एक नई समस्या लेकर आता है। अगर सरकार इमीग्रेशन बढ़ाती है तो समाज के एक बड़े हिस्से में विरोध और राजनीतिक तनाव बढ़ता है और अगर इमीग्रेशन को रोका जाता है तो काम करने वाले लोगों की कमी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर देती है। फैक्ट्रियां, हॉस्पिटल, केयर सेक्टर और सर्विस इंडस्ट्री पहले से ही लेबर की भारी कमी झेल रही हैं। विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अगर जन्म दर में कोई चमत्कारिक सुधार नहीं हुआ तो जापान के पास बाहरी लोगों पर निर्भर होने के अलावा कोई वास्तविक विकल्प नहीं बचेगा। यही वजह है कि कई अर्थशास्त्री और डेमोग्राफर अब इस स्थिति को अनसॉल्वेबल क्राइसिस कहने लगे हैं। जापान आज सिर्फ अपनी लड़ाई नहीं लड़ रहा बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी बन चुका है। यह उदाहरण दिखाता है कि जब जनसंख्या गिरती है तो उसका असर सिर्फ आंकड़ों या ग्राफ तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था, राजनीति, सामाजिक संरचना और राष्ट्रीय पहचान तक हिलने लगती है। और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जापान इस संकट से बाहर निकल पाएगा या फिर यही भविष्य बाकी विकसित देशों का भी इंतजार कर रहा है क्योंकि जापान आज जो झेल रहा है वह शायद कल दुनिया के कई देशों की हकीकत बन है।
Japan is facing its biggest demographic crisis in modern history. In just one year, nearly 9 lakh people disappeared from the population, driven by low births, rising deaths, and an aging society.
In this video, I break down why Japan’s population is collapsing, why young people are opting out of marriage and children, and whether immigration can realistically save the Japanese economy.
We’ll look at shocking data, government policy failures, and the hidden trade-offs Japan is now forced to make.
If you care about global migration, economic collapse, or the future of developed countries — this is a story you cannot ignore.
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This video is based on publicly available data and expert analysis. It is intended for educational and informational purposes only.
2 Comments
Not so. Labours for many fields goes for jobs.
They Should give Free time To Working class in japan work Culture is main problem